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Thursday, December 23, 2010

नदी (बाल -कविता )


मुझसे तुम बहना सीखो
सीखो जीना -मरना
सभ्यता जन्मी मेरे तट पर
ऐसा सबका कहना //

संकुचित कर मेरे मार्ग को
है मानव ने रोका
बाढ़ , कटाव और प्रदूषण
अब होगा सब सहना //

जीवनदायनी हूँ मैं सबकी
पशु ,पक्षी और मानव
मत फेको कचड़ा मुझमे
नहीं तो होगा रोना //

5 comments:

  1. Mujhe mat roko
    Anavrat chalne do
    Dharti ke har kone pe pahuchkar
    sabki pyas bujhane do

    Bahut sundar pandey ji. water resources ke preservation par janjagriti ke liye aur kavitayen aani chahiye. Aapka prayas sarthak ho .

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  2. यह बाल कविता नही है इसमे वस्तुत: बड़ों के लिये सन्देश है ।

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  3. सचमुच सुनी है नदी की आवाज आपने.

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  4. इतनी सरल भाषा में बहुत बडा सन्देश दिया है आपने ,बधाई ।

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  5. Hi there mates, its great post on the topic of cultureand fully defined, keep it up all
    the time.

    my website; source

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