
नीलगगन सी तेरी साडी
गहने चमके जैसे मोती
आओ प्रिय ,अब साथ चले
हम बनके जीवन साथी //
उपवन के फूलों सी जैसी
खुशबू तेरे बालों की
परागकणों से लदे हुए
क्या कहने तेरे गालों की //
यौवन की चादर में लिपटी
तेरी कंचन चितवन काया
रहकर तेरे संग- संग
अपने को सुवासित पाया //
अधरों का रस अमृत जैसा
नैन तुम्हारे गाए गीत
मखमली देह देख तुम्हारा
कामदेव नित मांगे भीख //
मैं तेरी कूँची बन जाऊ
तू बन जा मेरी कविता
दिन -रात चमकेंगे नभ पर
बन कर शशि और सविता //
WAH BABAN JI.....ROMANCE KI HADD TAK PAHUNCH JAATE HAI.....AAP......
ReplyDeleteWOW... Just this word is coming in my mind after reading ur this 'full of romantic' writting...!! :-)
ReplyDeleteMY PLEASURE JULIE JI ...
ReplyDeletePOEMS COMPOSED...AT ONCE...WHEN INNER FEELING COMES
क्या बात है, भाई.
ReplyDeleteसुन्दर रसभीनी कविता है.
शुभ कामनाएं.
एक बात तो बताएं?
तस्वीर देख कर कविता कहते हो या कविता लिख कर तस्वीर ढूंढते हो?
बड़ी सुन्दर कविता, श्रंगार में पगी।
ReplyDeleteबहुत अच्छे....मजेदार
ReplyDeletenice photograph----तस्वीर देख कर कविता कहते हो या कविता लिख कर तस्वीर ढूंढते हो?-----i agree with sagebob4 this piece of poetry
ReplyDeleteye kavita to tasveer dekh kar likhi ..
ReplyDeletenice sir ji...aapki lekhni ke kya kahne..jab kalam uthti hai to kuch achche hi shabd aa jate hai..kabhi madhubhari mithaas to kabhi saundary ka gungaan...nice
ReplyDeleteमैं तेरी कूँची बन जाऊ
ReplyDeleteतू बन जा मेरी कविता
दिन -रात चमकेंगे नभ पर
बन कर शशि और सविता
great!!!!!!!!!!
बबन जी...........बहुत खूब...........बहुत बढ़िया........प्रेम रस से सरोबार आपकी यह रचना.......
ReplyDelete//अधरों का रस अमृत जैसा
नैन तुम्हारे गाए गीत
मखमली देह देख तुम्हारा
कामदेव नित मांगे भीख ////........बहुत खूब....
both poem and pic are beautiful......writing very romantic these days...?????
ReplyDeleteअत्यंत कोमल,शीतल,सौम्य मगर उत्तेजक अभिव्यक्ति,
ReplyDelete"मैं तेरी कूँची बन जाऊं तू बन जा मेरी कविता"<>अति सुन्दर.
"अपने होटों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ"
बहुत भावपूर्ण काव्यमयी प्रस्तुति..
ReplyDeleteबहुत बेहतरीन व भावपूर्ण प्रस्तुति|
ReplyDeleteप्रिय बंधुवर बबन पांडेय जी
ReplyDeleteसादर अभिवादन !
शायद पहली बार आया हूं आपके यहां …
आपके यहां तो रूप रस में आकंठ भीगा यौवन कविता बन कर सबको मदहोश कर रहा है … क्या बात है !
परागकणों से लदे हुए
क्या कहने तेरे गालों की
अनुपम ! अवसर मिलने पर भला कोई कैसे अधरों के निशान अंकित नहीं करना चाहेगा ? … :)
अधरों का रस अमृत जैसा
नैन तुम्हारे गाए गीत
मखमली देह देख तुम्हारा
कामदेव नित मांगे भीख
फ़िदा हो गए जी हम तो …
आप पर भी !
आपकी रचना पर भी !!
आपकी रचना की नायिका पर भी !!!
♥ प्रेम बिना निस्सार है यह सारा संसार !
♥ प्रणय दिवस की मंगलकामनाएं! :)
बसंत ॠतु की भी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
एक-एक शब्द भावपूर्ण ..... बहुत सुन्दर रचना...
ReplyDeleteवाकई! असरदार अभिव्यक्ति है, बबन जी! देखा जाय तो आपने नारी के सारे गुणों, सोम्यता, ममता, चंचलता, मोहकता, सबका चित्रण श्रृंगारिक ढंग से, शब्दों में ऐसे पिरोया है की बस... ! उतेजना और सोम्य आनंद की अनुभूति होती है.
ReplyDeleteआपकी यह रचना सविता की तरह ओजपूर्ण, तेजस्वी है और शशि की तरह शांत, मधुर, सोम्य, दीप्तिवान भी...
सादर!
baban bhai namskar.........bahut hi sundar kavita aur, kya sundar bhavaybhivyakti hai....
ReplyDeleteमैं तेरी कूँची बन जाऊ
ReplyDeleteतू बन जा मेरी कविता
बहुत हि मादक तथा मन कि गहराई को छुती कविता है मै तो यही कहुं कि आप कविता बनाते हो या रसिला चित्र खींचते हो, आप चित्रकार भी हो और कवि भी मेरे मन को यह कविता भा गई.
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