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Wednesday, September 14, 2011

आह भी तुम, वाह भी तुम


आह भी तुम, वाह भी तुम
मेरे जीने की राह भी तुम
छूकर तेरा यौवन-कुंदन
उर में होता है स्पंदन
पराग कणों से भरे कपोल
हर भवरे की चाह तो तुम//

छंद भी तुम,गीत भी तुम
मेरे जीवन के मीत भी तुम
नज़र मिलाकर तुम मुस्काती
हर हंसी कविता बन जाती
हर काजल की स्याह हो तुम //
आह भी तुम, वाह भी तुम//

जब मैं खोलूं अपनी पलक
पा लेता तेरी एक झलक
रूठी हो क्यों, कुछ तो बोल
रब से बढ़ कर तेरा मोल
लाल-रंगीला लाह हो तुम
आह भी तुम, वाह भी तुम//

(चित्र गूगल से आभार )

22 comments:

  1. प्रेम की भाव के साथ समर्पण की जब भावना बन उठे तो शायद ये ही शब्द निकले ......अच्छी है !!!!बबन जी !!! nirmal

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  2. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  3. नज़र मिलाकर तुम मुस्काती
    हर हंसी कविता बन जाती
    हर काजल की स्याह हो तुम //
    आह भी तुम, वाह भी तुम//

    लाल-रंगीला लाह हो तुम
    आह भी तुम, वाह भी तुम//..
    prem ke satha agar samarpan ki bhavna mil jaaye to kya kehne... bahut badhiyaa ..Badhaai !

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  4. http://neelamkahsaas.blogspot.com
    aapki tippani ki mujhe bhi hamesha avashyakta rahti hai..:)

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    Replies
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  5. Baban Bhaiya..Prem ki Bahut sundar parikalpna...........Bahut sundar Rachana

    Dhananajay-Mishra

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  6. वाह रे प्रेम हर और तू है...फिर भी हर वक्त मैं तुझे ही ढूद्ता. हू....

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  7. देखी रचना ताज़ी ताज़ी --
    भूल गया मैं कविताबाजी |

    चर्चा मंच बढाए हिम्मत-- -
    और जिता दे हारी बाजी |

    लेखक-कवि पाठक आलोचक
    आ जाओ अब राजी-राजी |

    क्षमा करें टिपियायें आकर
    छोड़-छाड़ अपनी नाराजी ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  8. Pandey ji

    sundar rachna ke liye badhai sweekaren.
    मेरी १०० वीं पोस्ट , पर आप सादर आमंत्रित हैं

    **************

    ब्लॉग पर यह मेरी १००वीं प्रविष्टि है / अच्छा या बुरा , पहला शतक ! आपकी टिप्पणियों ने मेरा लगातार मार्गदर्शन तथा उत्साहवर्धन किया है /अपनी अब तक की " काव्य यात्रा " पर आपसे बेबाक प्रतिक्रिया की अपेक्षा करता हूँ / यदि मेरे प्रयास में कोई त्रुटियाँ हैं,तो उनसे भी अवश्य अवगत कराएं , आपका हर फैसला शिरोधार्य होगा . साभार - एस . एन . शुक्ल

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  9. बड़ा ही मनभावन प्रस्तुति।

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  10. शुक्रवार-http://charchamanch.blogspot.com/

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  11. क्या कहने, बहुत सुंदर

    छंद भी तुम,गीत भी तुम
    मेरे जीवन के मीत भी तुम
    नज़र मिलाकर तुम मुस्काती
    हर हंसी कविता बन जाती
    हर काजल की स्याह हो तुम //
    आह भी तुम, वाह भी तुम//

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  12. Hi I really liked your blog.

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  13. बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !
    सुन्दर प्रस्तुति...

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  14. बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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  15. bahut sundar photo hai bhai :)

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  16. श्रृंगार रस से भरपूर बहुत सुन्दर कविता !

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  17. प्रेमपूर्ण समर्पण.
    आशीष
    --
    लाईफ़?!?

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  18. A unique love poem... very appreciating//

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  19. वाह बब्बन भाई, वाह, क्या कहने , हमेशा की तरह बहुत ही सुन्दर कविताई की है, आह के साथ वाह, क्या बात है, कपोलो में मकरंद की कल्पना कवि के दूरगामी सोच की परिणति है, आपकी कविताओं में उर का प्रयोग तो आप का ब्रांड जैसा पहचान हो गया है, साथ में चित्र के बगैर तो इस कविता की कल्पना , कल्पना में भी नहीं हो सकती, बहुत बहुत बधाई, अन्य मित्रों को आपकी रचना पसंद करने पर बहुत बहुत आभार, ऐसे ही उत्साहित करते रहे आप, भविष्य में और भी अच्छी रचनाएँ , अच्छे अच्छे चित्रों के साथ बब्बन भाई अवश्य लेकर आयेंगे , ऐसा विश्वास है | एक बार पुनः बधाई स्वीकार करें बब्बन भाई |

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