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Wednesday, February 8, 2012

अनुभूति 5


शीशे के जार में
मछलियाँ कितनी खुश थीं
पानी में तैरकर //

अचानक
शीशा टूट गया
मछलियाँ फर्श पर तड़पने लगी /

तुम्हारे बिना
मैं कैसे रहता हूँ प्रिय!
प्रतिउतर में
उन तड़पती मछलियों से पूछ लेना //

4 comments:

  1. तड़प ये दिन रात की,
    कसक यह बिन बात की,

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  2. आपकी रचना अच्छी लगी,लाजबाब तड़पन,.....

    MY NEW POST...मेरे छोटे से आँगन में...

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  3. बहुत खूब ... पर ये मछलियाँ तब तक जिन्दा भी रहें तो वो पूछ भी लें ...

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  4. YOUR POEMS ARE EASILY UNDERSTANDABLE .... THAT DEPICTS ... ABOUT THE REAL VALUE OF LIFE.

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