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Saturday, October 22, 2011

प्रेम-नगाड़ा


सुना दो सांसों की सरगम
आज मिला लो उर से उर
बजने दो अब प्रेम नगाड़े
कसम तुम्हें है मेरे हुज़ूर //

उर के घर्षण की ऊर्जा से
खूब बहकता दिल का इंजन
कभी रेंगता,कभी सरपट दौड़ता
बिना लिए अब कोई इंधन //

जब घर्षण में इतनी ऊर्जा है
तो चुम्बन में कितनी होगी
ओ कामिनी ,मेरा कामदेव जगा दो
अपने उर का सोम-रस पिला दो//

11 comments:

  1. सुन्दर रचना , बधाई.

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  2. सुन्दर प्रस्तुति
    परिवार सहित ..दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएं

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  3. कुछ व्यक्तिगत कारणों से पिछले 20 दिनों से ब्लॉग से दूर था
    देरी से पहुच पाया हूँ

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  4. सुन्दर, श्रंगार पल्लवित।

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  5. षड्यंत्रों का जाल रच रहे, सब दुश्मन रहे सता
    प्रेम-नगाड़ा बात बिगाड़ा, पाण्डेय रहे बता
    राधा बनी श्याम सी साँवर, पर वन्दन देत जता
    "दीपक का त्यौहार आ गया तू कर ले रूप पता

    लिंक आपकी रचना का है
    अगर नहीं इस प्रस्तुति में,
    चर्चा-मंच घूमने यूँ ही,
    आप नहीं क्या आयेंगे ??
    चर्चा-मंच ६७६ रविवार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  6. सुन्दर रचना....
    सादर बधाई...

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  7. सुन्दर
    दीवाली कि हार्दिक शुभकामनाएं!

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  8. बबन जी आपकी समस्त रचनाएं श्रृंगार रस से लबालब हैं. अति सुन्दर .happy deepawali .

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  9. दीपावली केशुभअवसर पर मेरी ओर से भी , कृपया , शुभकामनायें स्वीकार करें

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