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Friday, January 20, 2012

मैं तुम्हें हँसने क्यों कहता हूँ ?


जानती हो प्रिय !
मैं तुम्हें हँसने क्यों कहता हूँ ...
तुम कहोगी ....
शायद ...मैं हँसते वक़्त ज्यादा सुंदर लगती हूँ /
मगर तुम गलत हो प्रिय !

तुम्हारी हंसी ...
पानी का वह छीटा है
जो सब्जी बेचने वालों द्वारा
पुरानी सब्जियों पर मारा जाता है
वे फिर से ताज़ी हो जाती हैं /
ठीक वैसे ही है
तुम्हारी हंसी //

13 comments:

  1. aapki ye panktiyan vaakayi hriday sparshi hain aur prem ki gahrayi ka ehsaas karaati hain...................................................... तुम्हारी हंसी ...
    पानी का वह छीटा है
    जो सब्जी बेचने वालों द्वारा
    पुरानी सब्जियों पर मारा जाता है
    वे फिर से ताज़ी हो जाती हैं /
    ठीक वैसे ही है
    तुम्हारी हंसी //

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  2. aapki ye panktiyan vaakayi hriday sparshi hain aur prem ki gahrayi ka ehsaas karaati hain...................................................... तुम्हारी हंसी ...
    पानी का वह छीटा है
    जो सब्जी बेचने वालों द्वारा
    पुरानी सब्जियों पर मारा जाता है
    वे फिर से ताज़ी हो जाती हैं /
    ठीक वैसे ही है
    तुम्हारी हंसी //

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  3. wah bhai badi hi adbht kavita hai aap ki wah bha wah

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  4. तुम्हारी हंसी ...
    पानी का वह छीटा है
    जो सब्जी बेचने वालों द्वारा
    पुरानी सब्जियों पर मारा जाता है
    वे फिर से ताज़ी हो जाती हैं

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  5. वाह! क्‍या बात है....
    खूबसूरती की तारीफ का नया अंदाज।

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  6. This comment has been removed by the author.

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  7. वाह!!!!!!ताजगी लाने नायाब नुस्खा,..अच्छी प्रस्तुति,बेहतरीन पोस्ट....
    new post...वाह रे मंहगाई...

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  8. वाह ...बहुत खूब ।

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  9. वाह: तरीफ का नया ही अंदाज..अच्छा लगा..अभिव्यंजना में आने के लिए धन्यवाद..

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