मेरे दिल की धड़कन मेरे होठों की बुलबुल मेरे दिए की ज्योति तुम कहाँ हो ... प्रिय!
लोग कहते हैं बसंत आया हैं तुम बिन कैसा बसंत प्रिय! सुनो ! तुम जब तक नहीं आओगी मैं ...... फूलों पर परागों का निषेचन कर रहे हर भवरे /हर तितली को उडाता फिरूंगा // (चित्र गूगल से साभार )
जानती हो प्रिय ! मैं तुम्हें हँसने क्यों कहता हूँ ... तुम कहोगी .... शायद ...मैं हँसते वक़्त ज्यादा सुंदर लगती हूँ / मगर तुम गलत हो प्रिय !
तुम्हारी हंसी ... पानी का वह छीटा है जो सब्जी बेचने वालों द्वारा पुरानी सब्जियों पर मारा जाता है वे फिर से ताज़ी हो जाती हैं / ठीक वैसे ही है तुम्हारी हंसी //
भ्रस्टाचार को जड़- विहीन करने से पहले ,तुम्हें सत्य पर चलना होगा काम, क्रोध ,लोभ ,मोह के चुम्बक से तुम्हें स्वं को हरना होगा बिगुल फुकने वाले हर नेता को , स्वं उन्हें बदलना होगा जन-जन को समझाने से पहले , तुम्हें स्वं से लड़ना होगा //
"अयं निजः परो बेति" का बीस-फूल तुम्हें मुरझाना होगा कदम-कदम ,हर मोड़-मोड़ पर , बिष का प्याला पीना होगा हर शबरी के घर में जाकर , उसका फल भी चखना होगा गाँधी बनने से पहले , पहले उन्हें तुम्हें पढना होगा //