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Wednesday, April 20, 2011

नीबुओं जैसी सनसनाती ताजगी


हम- तुम मिलते थे
दूसरों की नज़रों से बचते -बचाते
कभी झाड़ियों में
कभी खंडहरों के एकांत में
सबकी नज़रों में खटकते थे
फिर एक दिन ...
घर से भाग गए थे
बिना सोचे-समझे
अपनी दुनियाँ बसाने //

नीबुओं जैसी सनसनाती ताजगी
देती थी तेरी हर अदा
कितना अच्छा लगता था
दो समतल दर्पण के बीच
तुम्हारा फोटो रख
अनंत प्रतिबिम्ब देखना
मानो ...
तुम ज़र्रे-ज़र्रे में समाहित हो //

कहने को
हम अब भी
एक-दूजे पे मरते है
एक-दुसरे के साँसों में बसते हैं
एक-दूजे के बिना आहें भरते है
मगर ....
दिल के खिलौने को
हम रोज तोड़ते हैं
क्योकि हम प्यार करते है //

14 comments:

  1. प्यार ही प्यार | एक खुबसूरत एहसास को दर्शाती सुन्दर रचना |

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  2. गहन अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति ... हार्दिक बधाई.

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  3. दिल के खिलौने को
    हम रोज तोड़ते हैं
    क्योकि हम प्यार करते है /
    बहुत सुंदर।

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  4. सुन्दर अभिव्यक्ति

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  5. कहने को
    हम अब भी
    एक-दूजे पे मरते है
    एक-दुसरे के साँसों में बसते हैं
    एक-दूजे के बिना आहें भरते है
    मगर ....
    दिल के खिलौने को
    हम रोज तोड़ते हैं
    क्योकि हम प्यार करते है //bahut hisaarthak rachanaa.seedhe saral shabdon main likhi sunder rachanaa.badhaai sweekaren.


    mera blog main aane ke liye dhanyawaad.

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  6. bahut achchha likhte hai aap......comment dene ke liye shukriya

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  7. नींबू सी ताजगी भरी रचना | अच्छा लगता है आपको पढ़ना |

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  8. क्योंकि हम प्यार करते हैं... क्या बात है।
    अच्छी रचना।

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  9. गहन अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति|

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  10. very refreshing...just like nibu

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  11. बोले तो पुराना ..बहुत पुराना लि‍रि‍ल का एड याद आ गया

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  12. सुन्दर अभिव्यक्ति ... हार्दिक बधाई.

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  13. सुन्दर रचना, सार्थक प्रस्तुति
    स्वाधीनता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
    मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें .

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