मैं रूपोश में फिरता था , रुआब के लुट जाने से
आपकी सोहवत ने ,तो , मेरा रूतबा बढ़ा दिया //
आपकी चहलकदमी से, शबनम को शबाब आ गया
ज्योही रुख से नकाब हटा, सामने महताब आ गया //
(रुआब -- रोब , रूपोश - मुह छिपाने वाला , सोहबत -संगती ,शबाब - जवानी , महताब - चाँद)
अच्छी लगी आपकी कविता ..ऐसी सोहबत सबको मिले
ReplyDelete..पढ़ती रहे .. शुक्रिया
Deleteबहुत सुन्दर प्रस्तुति
Deleteबहुत खूब लिखा है आपने |
ReplyDeleteमेरे ब्लॉग पर भी पधारें |
its awesome i love it a lot
ReplyDeletea basket of thanks Devika
DeleteBAHUT NEEK LIKHNE BAANI SAA RAOUWAAN,,,,
ReplyDeletewah ,,kya bat hai,,,sunder tam,,,ap ke laekhni me jado hai ,,,thanks ,,pandey ji god bless u
ReplyDeleteरमेश भाई ... स्नेह बनाए रखे
Deletebahut khub
ReplyDeleteछा रहे हो दोस्त ,
ReplyDeleteतस्वीर बड़ी मारक ला रहे हो .
कहाँ से लाते हो ये खूबसूरत बदन ,
ये प्रसन्न बदन चेहरे ?
आपकी रचनाओं पे भारी पडतें हैं ये बिंदास चेहरे .
बहुत खूब और गहरा..
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