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Tuesday, July 24, 2012

अब बहारों की हो चली हूँ //

कभी धूल हूँ , कभी कली हूँ
बहुत देर  हो  चुकी तुम्हारे
इंतज़ार में , अब बहारों की हो चली हूँ  //

पहले तो तुम
लफ़्ज़ों के धागे और लवों की सुई से
हर जगह मेरा नाम टांक दिया करते थे
मेरी अदाओं  को छोडो
मेरी मुस्कान पर तुम रोज सौ बार मरा करते थे //

कभी कड़ी धुप हूँ ,तो कभी गुनगुनी
मुझसे क्या खता हो गई
क्यों कर देते हो ,अब हर बात अनसुनी //

मैं मयखाने नहीं जाऊँगा ,ग़मों को मिटाने
दरख्तों ने मुझसे कहा है
अब नए पत्तों को उगाने के दिन आ गए हैं //

Wednesday, June 20, 2012

यक्ष प्रश्न

बादलों के पीछे
इन्द्रधनुष का प्रतिबिम्बित होना
कमल के ऊपर
भवरे का मचलना
फूलों से लदकर
कचनार की डाली का झुक जाना
हरी दूब के उपर
ओस का टिके रहना
झरने के पानी का
पत्थरों से अठखेलियाँ करना
या फिर ....
इन सबको देखते
आपको मुस्कुराते /आँचल उड़ाते देखना
किसे अच्छा कहूँ
यक्ष प्रश्न है मेरे लिए //

Monday, May 14, 2012

सावन को आने दो

छा  गयी मस्ती तुम पर गोरी ,जब  से आया सावन 
मन भवरा क्यों  मचल उठा है ,होकर  भी यह बावन //

होठो से क्यों गीत  निकलते, जो पहले  सिले  हुए थे 
क्यों आग निकलता तन -मन से,जो पहले बुझे हुए थे 
अंग-अंग क्यों हुआ है पागल ,जब से आया सावन 
मन भवरा क्यों  मचल उठा है ,होकर  भी यह बावन //

झूले में उर का  आँचल का  उड़ना, लहराना गेसू  का 
हंसी शराब सी तेरे अधरों की, और लाली टेसू सा 
लाजवंती बनी क्यों कामवंती,जब से आया सावन 
 मन भवरा क्यों  मचल उठा है ,होकर  भी यह बावन //

हर जगह अब मोर -मोरनी, हैं कानों में कुछ बतियाते 
हर जगह अब शेर-शेरनी,   क्यों नहीं शोर मचाते 
ओ सावन के बादल , क्यों बना  दिया मुझको  रावण 
मन भवरा क्यों  मचल उठा है ,होकर  भी यह बावन //


Tuesday, April 24, 2012

तेरा आँचल आवारा बादल

तेरा आँचल  आवारा  बादल ,पता नहीं कहाँ बरसेगा  
 यौवन के इस  रसबेरी को पाने, कौन नहीं तरसेगा //

बूंद -बूंद मुस्कान होठों का, पता नहीं कब बन जाए ओला   
वह   होगा  शूरवीर ही ,जो झेले तेरी आँखों का  गोला  
देख लाल -लाल होठों  के फूल, तबियत  मेरी  बिगड़  रही 
उर  के  इस मक्खन  चखने, मन भवरा कब-तक तडपेगा //

सुरमई पवन हुई सुगन्धित ,और हुई सुवासित  बगिया 
कब होगा मधुर मिलन और कब मेरा  बाहं बनेगा तकिया   
हर मुस्कान एक झटका देती और हंसी गिराती बिजली 
गेसू से गिरते झरने में ,दुबकी लेने कौन नहीं तडपेगा //

Saturday, April 14, 2012

भूख तो कम हुई ,प्यास बढती गई


भूलने की कोशिस में , तुम और याद आती गई
हवा तो कम हुई , मगर वारिस बढती गई //

यादों की दरिया में मैं डूबता चला गया
भूख तो कम हुई ,मगर प्यास बढती गई //

आपकी मस्त साँसें भी गज़ब ढाती है मुझ पर
मौसम तो सर्द हुई , मगर तन की गर्मी बढती गई //

Tuesday, April 10, 2012

ग़ज़ल -2012

तुमको पाकर , मैं चांदनी में नहा गया
मगर कमबख्त सूरज खफा क्यों हो गया //

आप आये थे ,रुमाल से मेरे अश्कों को पोछने
मगर आप खुद ही अश्क बहा कर चल दिए //

दूसरों को पढने में , भूल गया था मैं अपना चेहरा
आज आईने में,अपना चेहरा ही बदरंग नज़र आया //

आपको देखकर , रूमानी होना कोई गुस्ताखी तो नहीं
पास आने की कोशिश में, मैंने चलना सीख लिया //

Tuesday, April 3, 2012

भूख


रोटी .....
मिटा देता है भूख
पेट की
फिर पैदा हो जाती है
वासना की भूख
संपत्ति की भूख
नाम कमाने की भूख
दूसरों को नीचा दिखने की भूख ॥
और आदमी
जिस दिन इन भूखों को मिटा लेगा
तो क्या हम उसे आदमी कहेगें ?

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