
सुना दो सांसों की सरगम
आज मिला लो उर से उर
बजने दो अब प्रेम नगाड़े
कसम तुम्हें है मेरे हुज़ूर //
उर के घर्षण की ऊर्जा से
खूब बहकता दिल का इंजन
कभी रेंगता,कभी सरपट दौड़ता
बिना लिए अब कोई इंधन //
जब घर्षण में इतनी ऊर्जा है
तो चुम्बन में कितनी होगी
ओ कामिनी ,मेरा कामदेव जगा दो
अपने उर का सोम-रस पिला दो//





