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Saturday, October 22, 2011

प्रेम-नगाड़ा


सुना दो सांसों की सरगम
आज मिला लो उर से उर
बजने दो अब प्रेम नगाड़े
कसम तुम्हें है मेरे हुज़ूर //

उर के घर्षण की ऊर्जा से
खूब बहकता दिल का इंजन
कभी रेंगता,कभी सरपट दौड़ता
बिना लिए अब कोई इंधन //

जब घर्षण में इतनी ऊर्जा है
तो चुम्बन में कितनी होगी
ओ कामिनी ,मेरा कामदेव जगा दो
अपने उर का सोम-रस पिला दो//

Tuesday, October 11, 2011

अब चैन कहाँ


कचनार सी कमर लचीली
और चुम्बक हैं तेरे नैन
नींद नहीं अब आँखों में
न आता दिन में चैन //

बिन पिए अब मैं ,बहकता
बिन कारण के हँसता -रोता
बिन पंख मैं उड़ता रहता
मैं कहता, अब दिन को रैन //

Thursday, October 6, 2011

तेरी आँखें


तुम मेरे नैनों की ज्योति
देख तुम्हें छाती हरयाली
बिन देखे तेरा सुन्दर मुखड़ा
दिल भटकता जैसे बोतल खाली//
तुम बिन मैं ,बिन डोर पतंग
बिन सुरभि जैसे कोई सुमन
खोलो अपने नैन नशीले
मुझे पिला दो पूरी प्याली //




स्वेत कमल पर हो बैठे
दो काले भवरे जैसी आँखें
शशि आई है तुम्हें खोजने
कर दो अब यह रैन मखमली //

कभी हभी गुलज़ार हैं आँखें
कभी पजी तलवार है आँखे
तेरी आँखों में छुपा खजाना
करना है अब मुझे रखवाली //

Wednesday, September 14, 2011

आह भी तुम, वाह भी तुम


आह भी तुम, वाह भी तुम
मेरे जीने की राह भी तुम
छूकर तेरा यौवन-कुंदन
उर में होता है स्पंदन
पराग कणों से भरे कपोल
हर भवरे की चाह तो तुम//

छंद भी तुम,गीत भी तुम
मेरे जीवन के मीत भी तुम
नज़र मिलाकर तुम मुस्काती
हर हंसी कविता बन जाती
हर काजल की स्याह हो तुम //
आह भी तुम, वाह भी तुम//

जब मैं खोलूं अपनी पलक
पा लेता तेरी एक झलक
रूठी हो क्यों, कुछ तो बोल
रब से बढ़ कर तेरा मोल
लाल-रंगीला लाह हो तुम
आह भी तुम, वाह भी तुम//

(चित्र गूगल से आभार )

Wednesday, April 20, 2011

नीबुओं जैसी सनसनाती ताजगी


हम- तुम मिलते थे
दूसरों की नज़रों से बचते -बचाते
कभी झाड़ियों में
कभी खंडहरों के एकांत में
सबकी नज़रों में खटकते थे
फिर एक दिन ...
घर से भाग गए थे
बिना सोचे-समझे
अपनी दुनियाँ बसाने //

नीबुओं जैसी सनसनाती ताजगी
देती थी तेरी हर अदा
कितना अच्छा लगता था
दो समतल दर्पण के बीच
तुम्हारा फोटो रख
अनंत प्रतिबिम्ब देखना
मानो ...
तुम ज़र्रे-ज़र्रे में समाहित हो //

कहने को
हम अब भी
एक-दूजे पे मरते है
एक-दुसरे के साँसों में बसते हैं
एक-दूजे के बिना आहें भरते है
मगर ....
दिल के खिलौने को
हम रोज तोड़ते हैं
क्योकि हम प्यार करते है //

Monday, April 18, 2011

अब वसंत को देखकर क्या होगा


फूलों के रस में डूबा है तेरा आँचल
बादल के रंग से रंगा है तेरा काजल
अब न वसंत को देखूंगा, न देखूंगा कमल
क्योकि ....
अब तुम खुद लगने लगी हो एक ताज महल //



जुगनुओ के दीप में, गुनगुनाती हुई शाम
तेरी मुस्कराहट पर पीता रहा, जाम पे जाम
अब न चाँद को देखूंगा ,न सुनुगा ग़ज़ल
क्योकि ...
अब राग मल्हार गाने लगे है तेरे पायल //

Thursday, March 17, 2011

जब लेती तुम गलबहियां



अंग- अंग से यौवन बरसे
अँखियाँ दागे फुलझरियां
पक्षी बन मन उड़ जाता
जब लेती तुम गलबहियां //

हर महीना फागुन सा लगता
जब तेरी पायल बजती
हर महीना सावन सा लगता
जब तेरी आँचल उड़ती
चेहरे पर गेसू उड़ती ऐसे
मानों करती है शशि
काले घन से अठखेलियाँ //
पक्षी बन मन उड़ जाता
जब लेती तुम गलबहियां //

अंग-अंग मेरे, तेरे होंगे
सरगम गायेंगी सांसें
संगम होंगें उर के
जब मिल जायेंगी बाँहें
कोयल चहके या न चहके
बगिया महके या न महके
महक उठेगी अमरइयां
पक्षी बन मन उड़ जाता
जब लेती तुम गलबहियां //

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